कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी विनायक चतुर्थी कहलाती है, क्योंकि यह तिथि स्वयं श्री गणेश को समर्पित है। हर चंद्र मास में दो चतुर्थियाँ आती हैं—अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष की यह विनायक तिथि और पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी। कार्तिक की हल्की गुलाबी ठंडक और दीपोत्सव-पश्चात का उल्लास इस पूजा को अतिरिक्त सौम्यता देता है। प्रातः स्नान कर गणपति को दूर्वा, सफ़ेद पुष्प, गुड़-मूंग के लड्डू और तिल के दीप अर्पित करें; घर-क्लेश शांति हेतु चढ़े हुए सफ़ेद पुष्पों की माला बनाकर मुख्य द्वार पर बांधना शुभ माना गया है। शास्त्र कहते हैं कि विनायक चतुर्थी के व्रत-पूजन से बुद्धि-बल बढ़ता है, बाधाएँ दूर होती हैं और परिवार में सौहार्द बना रहता है।