माघ पूर्णिमा—जिसे महा-माघी या मघा पूर्णिमा भी कहते हैं—सर्दी की आख़िरी ठनक में उजास की परत चढ़ा देती है। ज्योतिर्विद बताते हैं कि इसका नाम ‘मघा’ नक्षत्र से जुड़ा है, जबकि पुराणों में उल्लेख है कि आज के दिन स्वयं भगवान विष्णु गंगाजल में विराजमान होते हैं; इसलिए गंगा-स्नान का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। प्रयागराज का माह-भर चलने वाला कल्पवास भी इसी तिथि पर पूर्ण होता है—साधक सांसारिक मोह छोड़ नये संकल्प के साथ लौटते हैं। भोर में स्नान के बाद तांबे के कलश से सूर्यदेव को अर्घ्य दें और 108 बार “ॐ घृणि सूर्याय नमः” जपें; कहा जाता है कि इससे रक्तसंचार तेज़ होता है और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। तिल-गुड़, अन्न या कम्बल का दान करने से घर-परिवार में स्थायी समृद्धि और मानसिक शांति का आलोक बना रहता है, जबकि पुराने पापों का भार हल्का पड़ जाता है।