पौष शुक्ल पूर्णिमा, जिसे पौष पूर्णिमा कहते हैं, सूर्यदेव के माह और चंद्रमा की तिथि का अनूठा संगम है। हेमंत ऋतु के मध्य, जब सूर्य उत्तरायण होने को अग्रसर रहता है, यह दिन आध्यात्मिक ऊष्मा का आह्वान करता है। परंपरा के अनुसार श्रद्धालु गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान कर तिल-गुड़ अर्पित करते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं और चंद्रमा की शीतल किरणों का ध्यान करते हैं। कहा जाता है कि इस संयुक्त आराधना से मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं। स्नान-दान के साथ “ॐ आदित्याय नमः” तथा “ॐ चंद्राय नमः” जपने का विधान है। पौष पूर्णिमा से ही माघ-स्नान का पुण्यकाल भी आरंभ माना गया है, अतः इस दिन दिया गया अन्न, वस्त्र और तिल-दान कई गुना फल प्रदान करता है तथा साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थों की सिद्धि का आशीर्वाद मिलता है।