कल्कि जन्मोत्सव उस प्रतीक्षित दिवस की स्मृति है जिस दिन विष्णु का दशम अवतार कल्कि सतयुग-कलियुग की संधि पर अवतरित होगा। कल्कि तथा श्रीमद्भागवत-पुराण दोनों बताते हैं कि उनका प्राकट्य सावन शुक्ल पक्ष की संध्या-व्यापिनी तिथि में, शंभल ग्राम के विहरित नामक ब्राह्मण-कुल में होगा। मान्यता है कि जब अधर्म अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचेगा, तब कल्कि घोड़े पर आरूढ़, खड्ग धारण कर दुष्ट शक्तियों का विनाश कर धर्म की पुनः स्थापना करेंगे; इसलिए उन्हें “निष्कलंक भगवान” कहा गया है। राजस्थान के निंबार्क पीठ से लेकर गुजरात के निष्कलंक-मंदिर तक देश-भर में कल्कि के अनेक देवालय पहले ही विराजमान हैं—विष्णु का यही ऐसा अवतार है जिसकी पूजा अवतरण से पूर्व ही प्रारम्भ हो चुकी है। भागवत के द्वादश स्कंध, अध्याय 2 में इस अवतार का विस्तार से वर्णन मिलता है, जिसे पढ़कर भक्त वर्ष में एक दिन कल्कि-जन्म की प्रतीक्षा को उत्सव-रूप देते हैं।