भाद्रपद शुक्ल सप्तमी का ज्येष्ठ गौरी आवाहन महाराष्ट्र के दस दिन लम्बे गणेशोत्सव का अत्यंत मधुर पड़ाव है। यही वह घड़ी है जब गणपति‑माता गौरी को घर लाकर मराठी स्त्रियाँ अखंड सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। स्नान‑संध्या के बाद चाँदी या मिट्टी की प्रतिमा को मण्डप में विराजित कर हल्दी‑कुमकुम, चंदन, केसर और पुष्पों से सोलहों शृंगार किए जाते हैं। परम्परा में ‘सोलह’ शुभता का प्रतीक है, अतः सोलह सुहागिनों को आमंत्रित कर सोलह प्रकार की शृंगार‑वस्तुएँ, मेवे, फल और मिठाइयाँ भेंट की जाती हैं; गौरी को भी सोलह व्यंजन समर्पित होते हैं। संध्या को मंगलागौर गीतों के बीच आरती उतारी जाती है। विश्वास है कि श्रद्धा से सम्पन्न यह पूजन गृहस्थ जीवन में स्थायी सुख‑शांति और मातृ‑कृपा का संचार करता है।