भाद्रपद शुक्ल सप्तमी की ललिता सप्तमी राधा‑कृष्ण की प्रिय सखी ललिता देवी को समर्पित है। ऊँचागाँव (मथुरा) की यह सखी प्रेम‑रस की मर्मज्ञ मानी जाती है, इसलिए ब्रजमंडल में उनका गुणगान गोकुल से बरसाना तक गूँजता है। राधा अष्टमी से एक दिन पहले आने वाले इस व्रत पर स्त्रियाँ संतान‑कल्याण हेतु निर्जल रहती हैं, शिव‑पार्वती का स्मरण कर दक्षिणाभिमुख कलावा बाँधती हैं और लड्डू‑तुलसीदल चढ़ाती हैं। ब्रज में शरद की पहली उजास और धान की लहराती बालियों के बीच होने वाली यह पूजा प्रेम‑सौहार्द, दाम्पत्य‑दृढ़ता और संतानों की सुरक्षा का आशीर्वाद दिलाती है, और माना जाता है कि ललिता देवी का ध्यान वाणी में माधुर्य तथा हृदय में करुणा भी जगाता है।