भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को मनाई जाने वाली दूर्वा अष्टमी शाश्वत हरियाली और समृद्धि का प्रतीक पर्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन दूर्वा‑घास की पूजा से परिवार‑कुल की वृद्धि, मनोवांछित सिद्धि और आर्थिक उन्नति सहज हो जाती है। प्रातः स्नान के बाद शुद्ध घाटी की हरी दूर्वा को जल, कुंकुम और अक्षत अर्पित कर “ॐ दुर्वासविनमः” का जप किया जाता है; मान्यता है कि दूर्वा भगवान गणेश की प्रिय है, अतः बिना दुर्वा उनकी आराधना अधूरी रहती है। सावन की उमस उतरने और शरद की उजली धूप के बीच सम्पन्न यह व्रत घर‑आँगन को सतत् सौभाग्य से पुष्पित करता है, साथ ही सत्कर्मों में स्थिरता और मानसिक शांति का वरदान भी देता है।