ऋग्वेद उपाकर्म वैदिक अध्ययन की नयी सत्र-दीक्षा है, जो श्रावण शुक्ल पंचमी—श्रवण नक्षत्र—पर होती है। प्राचीन गुरुकुलों में इसी दिन वर्षावकाश के बाद शिष्य गुरु के पास लौटकर ऋचा-पाठ पुनः आरम्भ करते थे। समकालीन परम्परा में यज्ञोपवीतधारी साधक पुराना जनेऊ उतार कर नया धारण करते, त्रिपुण्ड लगाते, आचमन-संकल्प के बाद ऋषि-तर्पण और कम-से-कम 1,008 बार गायत्री-जप करते हैं। यह संस्कार याद दिलाता है कि ‘ब्राह्मणत्व’ जन्म से नहीं, सतत स्वाध्याय और साधना से अर्जित होता है। अंत में गुरुदक्षिणा अर्पित कर वेद-अध्यान का संकल्प दोहराया जाता है, जिससे ऋचा-स्वाध्याय, चारित्रिक अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व का नवचेतन प्रारम्भ हो सके।