भाद्रपद शुक्ल षष्ठी को मनाई जाने वाली स्कन्द षष्ठी भगवान कार्तिकेय के पराक्रम का उत्सव है। पुराणों के अनुसार इसी दिन कुमार ने दैत्य तारकासुर का वध कर देवसेना के सेनापति का पद ग्रहण किया, इसलिए व्रती दक्षिणाभिमुख होकर पूजा करते हैं, क्योंकि वही उनकी अधिष्ठित दिशा है। स्नान के बाद कार्तिकेय को लाल पुष्प, चंदन, घृत‑दीप और गुड़‑चावल का नैवेद्य अर्पित कर “देवसेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव, कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोऽस्तु ते” मंत्र कम‑से‑कम 108 बार जपना चाहिए। तिरुचेंदूर और पलानी सहित दक्षिण भारत के मुरुगन मंदिरों में इस दिन विशेष महोत्सव होता है। श्रद्धापूर्वक रखा गया व्रत साहस बढ़ाता है, रोग‑निवारण में सहायक होता है और मंगल ग्रह के अशुभ प्रभाव को शांत करता है।