मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला ‘श्री कालभैरव प्राकट्योत्सव’ शीत ऋतु की शुरुआत के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना जाता है। पुराणों में वर्णित है कि इसी तिथि पर कालभैरव प्रकट हुए और ‘ॐ कालभैरवाय नमः’ जप मात्र से रोग-विघ्न शांत होते हैं। रात्रिशील पूजन में काले तिल-उड़द, नीले पुष्पमाला, अक्षत, चंदन, काला वस्त्र, धतूरा तथा पाँच नींबू अर्पित करना शुभ माना गया है; इससे शत्रु-बाधाएँ निवृत्त होती हैं और परिवार में सुख-शांति, समृद्धि व दृढ़ स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष की ठंडी, स्वच्छ हवाओं में की गई भैरव-साधना वैसे ही है जैसे अँधेरी रात में दीप-प्रकाश—उम्मीद और सुरक्षा दोनों का प्रतीक।