अमावस्या के बाद जब पहली बार पतली-सी चाँद की रेखा झलकती है, वही क्षण चन्द्र-दर्शन कहलाता है। शास्त्र कहते हैं कि सूर्यास्त के तुरंत बाद पश्चिमी क्षितिज पर इस नव-चन्द्रमा को देखना बुद्धि, सौभाग्य और आरोग्य का वरदान देता है। उसी समय “ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्” मंत्र जगप कर जल से अर्घ्य अर्पित करने की परम्परा है। यदि यह दर्शन मार्गशीर्ष, अर्थात अगहन मास में हो, तो इसका पुण्य द्विगुणित माना गया है। यह वर्ष का नवां महीना है; गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है, “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्।” खेतों में नई धान-मेड़ स्वर्णिम होने लगती है, हवा में हल्की ठंडक घुल जाती है और अन्नकूट एवं गीता-जयन्ती जैसे उत्सव आरम्भ होते हैं। ऐसे पुण्यकाल में चन्द्र-दर्शन मन में नवीन ऊर्जा और आशा भर देता है।