संस्कृत दिवस — महत्व, कथा और परंपरा
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा, जिसे ऋषि-पर्व भी कहते हैं, पर संस्कृत-दिवस मनाया जाता है। वर्षा-ऋतु के इस पावन मास में जब धरती हरियाली ओढ़े रहती है, प्राचीन गुरुकुलों में नया शिक्षण-सत्र आरम्भ होता था और वेद-अध्ययन की प्रथम ऋचा गूँजती थी। परंपरा है कि इसी तिथि पर शिष्यों को गुरु-दीक्षा दी जाती थी; इसी के स्मरण में आज भी विद्यालयों और संस्कृत संस्थानों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार, नाट्य-प्रदर्शन, प्रश्नोत्तरी, सुलेख-स्पर्धा और व्याख्यान आयोजित किए जाते हैं। रक्षा-बंधन के दिन ही पड़ने वाली यह पूर्णिमा ऋषि-तर्पण का भी अवसर है, जब हम गुरु-शिष्य परम्परा तथा संस्कृत साहित्य की महिमा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। इस प्रकार संस्कृत-दिवस केवल भाषा-संरक्षण का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक बंधन को पुनर्संजीवित करने का संकल्प भी है।