श्रावण मास की पूर्णिमा—और कुछ परंपराओं में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी—को मनाया जाने वाला ‘माँ गायत्री प्राकट्योत्सव’ विद्या-साधना का परम पावन अवसर है। वर्षा से सराबोर श्रावण हरियाली, शीतलता और नाद से मन को अंतर्मुख बनाता है, जिससे मंत्र-जप का प्रभाव और गहरा होता है। वेदव्यास कहते हैं, जैसे दूध में घी और पुष्पों में मधु, वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री में निहित है; विश्वामित्र भी इसे सर्वश्रेष्ठ शुद्धि-प्रद मंत्र मानते हैं। जो साधक प्रतिदिन “ॐ भूर्भुवः स्वः…” का जप करता है, वह पापों को उसी तरह उतार देता है जैसे सर्प केंचुल त्यागता है। गंगा जहाँ तन को निर्मल करती है, वहीं गायत्री आत्मा को पावन बनाती है; इसी कारण इसे ‘ब्रह्म-गंगा’ कहा जाता है। भारतीय संस्कृति की जननी मानी जाने वाली माँ गायत्री से ही चारों वेद प्रकट हुए और ज्ञान की धारा आज तक अविरल बह रही है।