रांधण छठ गुजरात-कच्छ की पारंपरिक रस्म है, जो श्रावण कृष्ण षष्ठी को शीतला सतं के ठीक एक दिन पहले मनाई जाती है। इस दिन स्त्रियाँ तड़के उठकर मिट्टी के चूल्हे या गैस पर पूरे अगले दिन की ज़रुरत का अन्न-व्यंजन—खिचड़ी, पूड़ी, सब्ज़ी, लोट, लपसी इत्यादि—भोजन तैयार करती हैं; क्योंकि अगले दिन शीतला माता का व्रत होने पर अग्नि प्रज्ज्वलित नहीं की जाती। पकवान बन जाने के बाद चूल्हे पर हल्दी-कुमकुम लगाकर सुगंधित धूप-दीप से रंधण देवी (रांधण माता) का पूजन किया जाता है और ‘ठंडा भोजन भी तुष्टि दे’ ऐसा प्रार्थना-मंत्र बोला जाता है। मान्यता है कि रांधण छठ के नियमपालन से परिवार में रोग-उदर विकार दूर रहते हैं और शीतला माता की कृपा बनी रहती है। इस अनुष्ठान का सामाजिक संदेश भी है—स्वच्छ रसोई, समयबद्ध तैयारी और अग्नि-संरक्षण द्वारा संसाधन-सुरक्षा।