श्रावण शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला ‘श्री वरलक्ष्मी व्रत’ धन-समृद्धि की कामना का विशेष पर्व है। देवी महालक्ष्मी के वरदाता स्वरूप को ‘वरलक्ष्मी’ कहा गया है; मान्यता है कि श्रद्धा-पूर्वक पूजन करने से साधक की मनोरथ-सिद्धि अवश्य होती है। प्रातः स्नान के बाद कलश पर सौभाग्य चिन्हों सहित देवी-प्रतिमा स्थापित कर अखंड घृत-दीप प्रज्वलित करें। तत्पश्चात श्रीसूक्त, विष्णुसहस्रनाम और हरिवंश पुराण का पाठ कर पुष्प, नैवेद्य व स्वर्ण अथवा वस्त्र अर्पित करें। देवी के चरणों में कौड़ियाँ, हल्दी-कुंकुम एवं नवधान्य समर्पित करना शुभ माना जाता है। ‘वर’ का अर्थ वरदान तथा ‘लक्ष्मी’ का अर्थ वैभव से है—इस व्रत के प्रभाव से परिवार में लक्ष्मी-कृपा, आरोग्य और सौभाग्य स्थायी रूप से निवास करते हैं।