नारली पूर्णिमा श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और विशेष-कर कोंकण व महाराष्ट्र के मछुआरा-समुदाय का महत्वपूर्ण समुद्री पर्व है। इस दिन समुद्र को वरुण देव का स्वरूप मानकर उनकी कृपा व सुरक्षा के लिए नारियल अर्पित किया जाता है—इसी कारण इसे “नारली” (नारियल) पूर्णिमा कहते हैं। प्रातः स्नान के बाद नई धोती-साड़ी पहन कर लोग समुद्र-किनारे एकत्र होते हैं; नारियल पर कुमकुम-हल्दी लगाकर दीप, पुष्प, अक्षत व सुपारी संग पूजा की जाती है, फिर नारियल समुद्र में प्रवाहित कर नावों पर केसरिया पताका बाँधी जाती है। मान्यता है कि इससे आगामी मछली पकड़ने का मौसम सुरक्षित व समृद्ध रहता है। घरों में नारियल-चूरा, गुड़ और चावल से बने नारळी-भात व नारियल लड्डू का नैवेद्य तैयार होता है। यही दिन उत्तर भारत में रक्षा-बंधन और दक्षिण में श्रावण पूर्णिमा अवनि-अवित्तम संस्कार का भी सूचक है, जो भारतीय तटीय व आन्तरिक लोकसंस्कृतियों को एक साथ पिरोता है।