आश्विन शुक्ल पूर्णिमा की उजली रात, जिसे कोजागर या शरद पूर्णिमा कहा जाता है, देवी लक्ष्मी के जागरण‑पर्व का प्रधान दिवस है। नारद‑पुराण के अनुसार व्रती प्रातः स्नान कर उपवास का संकल्प लेते हैं। पीतल, ताँबे, चाँदी या स्वर्ण की लक्ष्मी‑प्रतिमा को वस्त्र से ढँक कर पुष्प, अक्षत, धूप‑दीप और मंत्रोच्चार से पूजन किया जाता है। चन्द्रोदय के साथ घी के 100 दीपक प्रज्वलित होते हैं; दूध‑चावल की खीर खुले आकाश तले रखी जाती है, जो चंद्र‑किरणों का अमृत ग्रहण करती है। वही प्रसाद देवी को अर्पित कर ब्राह्मणों और ज़रुरतमंदों में वितरित किया जाता है। अगले प्रातः पुनः लक्ष्मी‑पूजन के बाद व्रत पारण होता है। शरदकालीन आश्विन माह का स्वच्छ नभ, मंद बयार और पके धान की सुवास इस साधना को समृद्धि, जागरूकता और शुभकार्यता का उत्सव बना देती है।