आचार्य माधवाचार्य का जन्म विजय‑दशमी के पावन दिन, दक्षिण कन्नड़ के बेलालि ग्राम में विक्रम संवत 1256 (ई. सन् 1199) में हुआ। बाल्यकाल से ही वे अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे; सन्यस्त होकर उन्होंने आनन्दतीर्थ नाम ग्रहण किया और ब्रह्मसूत्र‑भाष्य तथा दस उपनिषदों पर गूढ़ टीकाएँ रचीं। भगवान श्रीराम के प्रति उनकी अपार श्रद्धा थी। उत्तराखण्ड यात्रा के समय वे बदरी‑आश्रम से दिग्विजयी राम की पाषाण‑मूर्ति दक्षिण ले आए; बाद में शिष्य नरहरि‑तीर्थ के माध्यम से जगन्नाथ‑पुरी से मूल राम‑सीता की प्रतिमा मँगवाकर मैसूर में प्रतिष्ठित की। समाज‑सुधारक रूप में उन्होंने भक्ति‑मार्ग को लोकाभिमुख बनाया और वेदांत को तर्कपूर्ण शैली दी। अनेक स्थानों पर भक्तजन उन्हें पवित्र पवनपुत्र हनुमान का अवतार मानकर नमन करते हैं, क्योंकि उनके जीवन में ज्ञान, भक्ति और साहस का अद्भुत संगम दिखाई देता है।