केदार गौरी व्रत, दक्षिण भारत में दीपावली-अमावस्या के दिन किया जाने वाला पारंपरिक उपवास है, जिसमें शिव के ‘केदारेश्वर’ स्वरूप और गौरी की संयुक्त पूजा होती है। मान्यता है कि पार्वती ने इसी व्रत की तपस्या से शिव को अर्धांग प्राप्त किया, इसलिए यह दांपत्य-सौभाग्य, परिवार-कल्याण और मनोवांछित सिद्धि का अनुष्ठान माना जाता है। व्रतधारी 21 दिन पूर्व से सरल आहार, ब्रह्मचर्य और बिल्वदल-अर्पण का नियम निभाते हैं; समापन-दिवस पर काली तिल मिश्रित जल से शिव-लिंग अभिषेक, 21 गांठों वाले सफेद सूत की माला, 21 प्रकार के नैवेद्य तथा “ॐ केदारेश्वराय नमः” मंत्र का 108-जप किया जाता है। कथा-पाठ ‘केदार-कल्पम्’ से होता है और घी-दीप जला कर आरती के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत पूरा होता है। विश्वास है कि यह उपासना मोह-रोग-ऋण हरण कर सुख, समृद्धि और शिव-सायुज्य का वरदान देती है।