कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्दशी पर मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी दीपोत्सव-पंचक का दूसरा सोपान है। परम्परा के अनुसार, प्रातः अभ्यंग-स्नान के बाद, संध्या-बेला में यमराज, श्रीकृष्ण और हनुमानजी का विधिवत पूजन किया जाता है। तिल या सरसों के तेल का दीप, गृह-द्वार की दोनों चौखटों और कार्य-स्थल के प्रवेश-मार्ग पर दक्षिणाभिमुख रखकर यम-दीपदान किया जाता है; इससे अकाल-मृत्यु का भय दूर होता है और लक्ष्मी का स्थायी वास माना जाता है। यह तिथि रूप चतुर्दशी भी कहलाती है, अतः श्रीकृष्ण-आराधना से सौंदर्य, तेज और आरोग्य की प्राप्ति होती है। कार्तिक की हल्की शीतलता और दीप-अनुराग के बीच किया गया यह अनुष्ठान भय-निवारण, धन-समृद्धि और आत्म-प्रभा का त्रिवेणी संगम रचता है।