दीपावली की अमावस्या-रात्रि पर लक्ष्मी-पूजा धन-समृद्धि और सौभाग्य का परम क्षण मानी जाती है। मान्यता है कि विष्णु के योग-निद्रा में होते ही महालक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण कर स्वच्छ, उजले घरों में प्रवेश करती हैं; इसलिए दिनभर झाड़-पोंछ, रंगोली और दीप-सज्जा अनिवार्य है। संध्या-काल में परिवार पूर्वमुख बैठकर कलश-स्थापना करता है, चावल के ढेर पर कमलासन लक्ष्मी की प्रतिमा विराजित होती है। गंगा-जल, केसर, दही, घृत, शहद व गन्ने के रस से अभिषेक के बाद सिंदूर, कमल, दूर्वा, बिल्वपत्र और नव-धान अर्पित किए जाते हैं। चार-मुखी दीप में घी या तिल-तेल भरकर प्रज्ज्वलित किया जाता है तथा “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का 108 बार जप किया जाता है। अंत में गृहलक्ष्मी प्रथम आरती उतारकर कौड़ी, चाँदी के सिक्के व नये बही-खाते चरणों में रखती हैं; यही नए आर्थिक वर्ष का शुभारंभ माना जाता है।