काली-पूजा मुख्य रूप से बंगाल, असम और ओडिशा में कार्तिक अमावस्या की गहन रात को सम्पन्न होती है। मान्यता है कि इसी घड़ी माँ काली जाग्रत रहती हैं, अतः साधक तांत्रिक विधि से उनका आवाहन करते हैं। शुद्धि-स्नान के बाद लाल या काले वस्त्र धारण कर भक्त “ॐ क्रीं कालिकायै नमः” मंत्र का 108 या 1008 बार जप करते हैं। जवाकुसुम, नीला चंदन, तिल के दीप, नारियल, मिठाई, चावल तथा कभी-कभी मदिरा-लड्डू या पशु-अग्नि-नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। काली-प्रतिमा के चरणों में रक्त-सिंदूर और बेलपत्र चढ़ाना अनिवार्य माना गया है, जबकि दक्षिणा में काले तिल, लोहे अथवा काले वस्त्र का दान शुभ फल देता है। दीपावली के लक्ष्मी-पूजन की तरह ही यह अनुष्ठान भी दुष्ट-ऊर्जाओं के नाश और धन-समृद्धि के आवाहन का प्रतीक है। लोक-मान्यता है कि माँ काली भय, रोग, ऋण और शत्रु-शंका दूर कर साधक को निर्भयता, सामर्थ्य और सिद्धि का वरदान देती हैं, इसलिए इस रात्रि में लोग नए उद्यम और आत्मबल का दृढ़ संकल्प लेते हैं।