सावन की भीनी फुहारें थमते ही भाद्रपद का आगमन होता है। चातुर्मास का यह दूसरा चरण कल्याण का संदेश लाता है। ‘भाद्र’ का अर्थ है शुभ; इसलिए यह मास पुण्य-कर्मों और उत्तम फल के बीज बोने का अवसर माना गया है। परम्परा कहती है कि पीले वस्त्र धारण करें, क्योंकि यह रंग सूर्य के समान ऊर्जा और मानसिक संतुलन प्रदान करता है। रोहिणी नक्षत्र के वृष लग्न में इसी मास श्रीकृष्ण अवतरित हुए, अतः जन्माष्टमी की रात्रि भक्ति-प्रदीप्त हो उठती है। शीघ्र ही गणेश चतुर्थी विघ्नहर्ता का मंगलमय स्वागत कराती है, जबकि ऋषि पंचमी और हरितालिका तृतीया नारी-शक्ति तथा ऋषि परम्परा का स्मरण कराती हैं। खेतों में धान की बालियाँ लहराने लगती हैं; वर्षा की आर्द्रता घटती है और शरद की शीतल हवा धीरे-धीरे द्वार पर आ ठहरती है। भाद्रपद कल्याण और नवीन आशा का स्वर्णिम संगम प्रतीत होता है।