शीतला सातम गुजरात-कच्छ का पारंपरिक पर्व है, जो श्रावण कृष्ण सप्तमी (रांधण छठ के अगले दिन) पर मनाया जाता है। इस दिन चूल्हा नहीं जलता; परिवार पूर्वदिवस पके ठंडे भोजन—खिचड़ी-कढ़ी, दाल-भात, लोट-लपसी, पूड़ी-सब्ज़ी—ही ग्रहण करते हैं। प्रातः स्नान के बाद शीतला माता की मिट्टी या धातु-प्रतिमा पर हल्दी-कुमकुम, गुड़, सुपारी, दूब और ठंडा दूध अर्पित किया जाता है। महिलाएँ मौली बाँध कर माता से दैहिक ताप, चेचक-खसरा तथा वात-पित्त के दोष से रक्षा की प्रार्थना करती हैं और घर-आँगन में गोबर से चौक पूरती हैं। मान्यता है कि ठंडा प्रसाद ग्रहण करने व अग्नि-विराम रखने से वातावरण शीतल रहता है, रोगाणु शांत होते हैं और शीतला माता कुटुम्ब पर अपना स्वास्थ्य-कवच बनाए रखती हैं।