ब्रज‑भूमि में गोवर्धन‑परिक्रमा मार्ग पर स्थित राधा‑कुंड को प्रयाग जितना ही पावन माना जाता है। कार्तिक‑मास की कृष्ण अष्टमी पर सुहागिनें यहाँ स्नान कर पुत्र‑प्राप्ति का आशीर्वाद माँगती हैं। जिन दम्पतियों को अब तक संतान‑सुख नहीं मिला, वे सप्तमी की रात्रि से निर्जला उपवास रखते हुए पुष्य‑नक्षत्र के आधी‑रात क्षणों में जल‑डुबकी लगाते हैं। लोक‑कथाएँ बताती हैं कि राधारानी ने अपने कंगन से भूमि खोदकर यह सरोवर बनाया, और श्यामसुंदर ने प्रेमपूर्वक इसे “राधा‑कुंड” नाम दिया। कार्तिक की हल्की शीतलता, तुलसी‑मंगल और दीप‑पंक्तियाँ इस अनुष्ठान को अतिरिक्त दिव्यता देती हैं। जन‑विश्वास है कि राधा‑कुंड में एक बार स्नान करने से मन की मलिनता मिटती है, दाम्पत्य‑जीवन में मधुरता आती है और वंश‑वृद्धि का वर मिलता है।