कार्तिक‑मास की कृष्ण अष्टमी को मनाई जाने वाली अहोई अष्टमी मातृत्व‑स्नेह और कुल‑समृद्धि का अद्वितीय उत्सव है। इस दिन माताएँ निर्जला व्रत रखकर अहोई माता तथा सप्त ऋषियों के चित्र के सामने प्रार्थना करती हैं कि संतान दीर्घायु, प्रतिष्ठित और कष्ट‑रहित रहे। चंद्रमा या नक्षत्रों का दर्शन करके व्रत खोला जाता है; इन्हें संतानों के उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक माना जाता है। कार्तिक स्वयं देव‑उत्थान, दीपदान और धर्म‑साधना का पावन काल है, दीपावली से ठीक एक सप्ताह पूर्व आने वाला यह व्रत घर‑आँगन में आध्यात्मिक ऊष्मा भर देता है। परम्परा के अनुसार पुत्रवधुएँ सासु‑माँ के चरणों को तीर्थ मानकर आशीष ग्रहण करती हैं, जिससे पीढ़ियों का प्रेम और संस्कार दोनों सुरक्षित रहते हैं।