आश्विन शुक्ल पूर्णिमा की शीतल चाँदनी में महर्षि वाल्मीकि जन्मोत्सव उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। आदि‑काव्य रामायण के प्रणेता वाल्मीकि जी ने संस्कृत साहित्य को प्रथम श्लोक प्रदान कर काव्य परम्परा की आधारशिला रखी। यही पूर्णिमा शरद या कोजागर पूर्णिमा भी कहलाती है, जब देवी लक्ष्मी के अवतरण की स्मृति में दीप‑आराधना की जाती है। ऋषि वाल्मीकि का जीवन पतन से उत्थान की प्रेरक यात्रा है; उन्होंने दुष्कर्मों का परित्याग कर भक्ति, सत्य और करुणा का पथ अपनाया तथा मानवता को धर्म और मर्यादा का संदेश दिया। इसी आदर्श को जन‑जन तक पहुँचाने के लिए यह जन्मोत्सव मनाया जाता है, जो हमें अपने व्यवहार में सद्गुणों का संचार कर समाज में सद्भाव व नैतिकता बढ़ाने की प्रेरणा देता है।