श्रावण मास के दूसरे मंगलवार को रखा जाने वाला द्वितीय मंगला गौरी व्रत देवी पार्वती के मंगल स्वरूप की आराधना का विशिष्ट दिवस है। प्रातः स्नान उपरान्त व्रती चौकी पर गौरी माता की प्रतिमा स्थापित कर सोलह मुखों वाला दीप प्रज्वलित करते हैं तथा फल, मिष्ठान्न, पुष्प, वस्त्र आदि सोलह प्रकार की सामग्रियाँ अर्पित करते हैं; ‘सोलह’ संख्या को सौभाग्य और पूर्णता का प्रतीक माना गया है। मंगला गौरी को महागौरी—आदि शक्ति का आठवाँ रूप—भी कहा गया है, जिनकी कृपा से दाम्पत्य सुख, समृद्धि और मंगल भाव सुदृढ़ होते हैं। पूजा के उपरान्त ब्रह्मा ऋषि-निर्दिष्ट “अस्य स्वयंवरकलामंत्रस्य ब्रम्हा ऋषि, अतिजगति छन्द:, देवीगिरिपुत्रीस्वयंवरादेवतात्मनो अभीष्ट सिद्धये” मंत्र का जप कर इच्छित फल की प्रार्थना की जाती है। श्रद्धा और नियम सहित किया गया यह व्रत विवाह-सम्बन्धी बाधाएँ तथा गृहकलह शांत कर परिवार में सुख-शांति का संचार करता है।