श्रावण के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाने वाली ‘गजानन संकष्टी चतुर्थी’ जीवन से बाधाएँ दूर करने का अचूक अवसर मानी जाती है। जन विश्वास है कि मंगलकार्य प्रारंभ करने से पहले विघ्नहर्ता गणेश का स्मरण कर्म को सफल बनाता है। हर माह दो चतुर्थियाँ आती हैं, शुक्ल पक्ष की ‘विनायक’ और कृष्ण पक्ष की ‘संकष्टी’; मंगलवार को पड़ने पर इसे ‘गजानन संकष्टी’ कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु सूर्योदय से उपवास रखते हैं, दुर्वा, लाल फूल व मोदक अर्पित करके चंद्र-दर्शन के बाद व्रत पूर्ण करते हैं। दुर्वा को अमृतस्वरूप माना गया है, अतः इसकी अर्पणा से स्वास्थ्य-लाभ और पाप-नाश दोनों का विश्वास जुड़ा है। दान-पुण्य और प्रभुचिंतन के संग यह व्रत वर्षा-ऋतु के उल्लास को भी आध्यात्मिक रंग देता है।