माघ मास की गहराती सर्दी में, जब दिन छोटे और रातें लंबी होती हैं, भगवान शिव का तेजस्वी कालस्वरूप, श्री भैरव, भक्तों को निर्भीक रहने का संदेश देता है। इस माह की कालाष्टमी, जिसे भैरवाष्टमी भी कहते हैं, साल की बारहों कालाष्टमियों में सर्वोच्च मानी गई है। भक्त असितांग, चंड, रूरू, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहार—भैरव जी के आठों स्वरूपों का विधिवत पूजन करते हैं, हालांकि बटुक भैरव की विशेष आराधना सबसे अधिक प्रचलित है। सरसों के तेल का दीप, काले तिल, गुड़ और नारियल चढ़ाकर संकटों का निवारण माँगा जाता है। प्रचलित विश्वास है कि कालभैरव अष्टक का सस्वर पाठ भय, रोग और अनिष्ट शक्तियों से रक्षा कर साधक को अचल साहस प्रदान करता है, ठीक वैसे ही जैसे माघ का उजला सूर्योदय शीत की कठोरता को हर लेता है।