पौष मास की ठिठुरती सर्दी में आने वाली श्री कालभैरव कालाष्टमी—कृष्ण पक्ष अष्टमी—भगवान शिव के उग्र‑रूप कालभैरव की आराधना का विशेष अवसर है। शास्त्रों में कालभैरव को कालजयी और तंत्र‑साधना का अधिपति कहा गया है; उनकी पूजा से शनि, मंगल और राहु के प्रतिकूल प्रभाव शांत होते हैं। नारद पुराण बताता है कि भैरव‑उपासना से रोग, दुःख और भय दूर होकर मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। पौष के ठंडे संध्याकाल में पीपल‑वृक्ष के नीचे बैठकर महामृत्युंजय मंत्र की सात मालाएँ जपना सर्वत्र रक्षा देता है। वर्ष भर कुल बारह कालाष्टमी मनाई जाती हैं, पर पौष‑कालाष्टमी का तप‑जप विशेष फलदायी माना जाता है, क्योंकि यह माह स्वयं अनुशासन और साधना के लिए विख्यात है।