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चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत

29 मार्च 2027 · सोमवार फाल्गुन, कृष्ण सप्तमी

चैत्र माह में मासिक कालाष्टमी व्रत कब है?

संक्षिप्त उत्तर

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत 2027 कब है?

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत 2027 सोमवार, 29 मार्च 2027 को मनाई जाएगी। चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत की तिथि फाल्गुन, कृष्ण सप्तमी है। चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त 05:53 – 08:21 तक रहेगा।

दिनांक29 मार्च 2027
तिथिफाल्गुन, कृष्ण सप्तमी
पूजा मुहूर्त05:53 – 08:21
पर्व जानकारी

पर्व सारांश

मुख्य तिथिफाल्गुन, कृष्ण सप्तमीचैत्र माह के व्रत-त्योहार
मुख्य देवताShri Kaal Bhairav
वार-देवताशिव जीसोमवार
नक्षत्रमूलव्यतीपात
संक्षिप्त परिचय

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत का महत्व और उत्सव

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत फाल्गुन, कृष्ण सप्तमी तिथि को मनाया जाने वाला हिंदू पर्व है। इस दिन Shri Kaal Bhairav की पूजा की जाती है और सुख-समृद्धि एवं रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

पंचांग विवरण

त्योहार का पंचांग और शुभ समय

मुख्य पंचांग विवरण

तिथि (सूर्योदय)कृष्ण सप्तमी
नक्षत्रमूल
योगव्यतीपात
करणबव
ऋतुवसन्तउत्तरायण
संवत्सररौद्र
दिशा शूलपूर्वदर्पण देखकर या दूध पीकर

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत के दिन पूजा, स्नान और दान का शुभ समय

मुहूर्त / योगसमयउपयोगस्थिति
ब्रह्म मुहूर्त 04:17 – 05:05 स्नान, जप, संकल्प शुभ
प्रातः पूजन 05:53 – 08:21 पूजा और संकल्प श्रेष्ठ
अभिजीत मुहूर्त 11:38 – 12:27 सामान्य शुभ कार्य शुभ
विजय मुहूर्त 16:34 – 17:23 कार्य-सिद्धि, संकल्प शुभ
सन्ध्या पूजन 17:25 – 18:37 दीप, आरती, कथा शुभ
राहु काल (वर्ज्य) 07:25 – 08:57 शुभ कार्य में टालें सावधानी
तिथि शुरू 29 Mar 05:10 PM
ब्रह्म मुहूर्त जप / स्नान 04:17–05:05
प्रातः पूजा मुख्य संकल्प 05:53–08:21
अभिजीत शुभ मुहूर्त 11:38 – 12:27
तिथि समाप्त 30 Mar 07:39 PM
सन्ध्या पूजन दीप, आरती 17:25–18:37

समय वाराणसी के सूर्योदय/सूर्यास्त पर आधारित हैं; स्थान अनुसार थोड़ा अंतर संभव है।

पर्व विवरण

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत — महत्व, कथा और परंपरा

चैत्र मास की मासिक कालाष्टमी हिंदू कैलेंडर में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। चैत्र का महीना ऋतु परिवर्तन का समय होता है, जब वसंत अपने पूर्ण रूप में होता है और प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार दिखाई देता है। इसी पावन काल में कालाष्टमी का व्रत विशेष फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान शिव के उग्र स्वरूप बाबा काल भैरव की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि पंचामृत से अभिषेक करने से रोगों और संभावित दुर्घटनाओं से रक्षा होती है। कार्यों में सफलता के लिए भैरव जी को जलेबी और नारियल का भोग अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में गरीबों में वितरित किया जाता है। काल भैरव की उपासना से मंगल दोष का शमन होता है और भय, बाधा व नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। यह व्रत साहस, सुरक्षा और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।

श्री कालभैरव की पूजा के लाभ  

भैरव शिव जी का ही अति-क्रोधित रूप है, इनकी पूजा करने से नकारात्मक शक्तियां पास नहीं आती और हर तरह की नकारत्मकता से मुक्ति भी प्राप्त होती है। इसके अलावा इनकी आराधना से शारीरिक और मानसिक परेशानियों से भी छुटकारा मिलता है।

बाबा भैरवनाथ की साधना सिद्धियों की प्राप्ति के लिए तांत्रिक और योगी करते है, इन्हें राहू ग्रह का देवता भी कहा गया है इसी कारण राहू के प्रभाव से पीड़ित लोग भी बाबा कालभैरव की आराधना करते है । श्री भैरव जी का सम्बन्ध महाविद्या की देवी भैरवी से भी बताया गया है, जो लग्न शुद्द्धि का वरदान देने वाली मानी गयी है, इनकी कृपा से शरीर, मन, चरित्र और आत्मा शुद्ध होती है । श्री काल भैरव की आराधना से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, और सभी प्रकार के सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है ।

कैसे हुयी श्री कालभैरव की उत्पत्ति

जब एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु में यह बहस छिड़ गयी कि उनमे से कौन सर्वश्रेष्ठ है तो वो इसका फैसला कराने के लिए वेद शास्त्रों के पास पहुंचे। वेदों ने उन्हें कहा कि जो इस सृष्टि में सबसे अधिक शक्तिशाली है और जिन्हे सबसे अधिक पूजा जाता है वो ही सबसे श्रेष्ठ है और वो भगवान शिव है। वेदों की बातों को सुनकर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर गुस्से में आ गया और वह शिव जी के बारे में अपशब्द कहने लगा जिसे सुन कर वेद बेहद दुखी हुए।
उसी समय वहां शिव जी एक दिव्य ज्योति के रूप में प्रकट हुए। उन्हें देख कर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर फिर से उनका अपमान करने लगा, अपने अपमान पर शिव जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की लेकिन उनके शरीर से एक अति क्रोधित स्वरुप विशाल दंडधारी आकृति प्रकट हो गयी ।

भैरव का नामकरण

कालभैरव के प्रकट हो जाने पर भगवान शिव ने कहा, “काल भैरव’! तुम ब्रह्मा पर शाशन करो, तुम काल के भी काल हो और तुमसे स्वयं काल भी डरेगा, तुम सम्पूर्ण विश्व का भरण करने में समर्थ हो इसी कारण तुम्हारा नाम कालभैरव होगा । तुम दुष्टों का नाश करने वाले “आमर्दक’ के नाम से भी जाने जाओगे और भक्तों के सभी पापों का भक्षण करने के कारण तुम्हे “पापभक्षण’ भी कहा जाएगा ।  

श्री कालभैरव का क्रोध और ब्रह्म हत्या 

तब, अति क्रोधित दंडधारी बाबा कालभैरव ब्रह्मा जी का सम्पूर्ण संहार करने के लिए आगे बढ़ गये, तभी श्री विष्णु ने उन्हें रोकने का आग्रह किया तब शिव जी द्वारा रोकने पर यह काया शांत हो गयी किन्तु क्रोधवस इन्होने ब्रह्मा जी के पांचवें सर को अपने हाथ की छोटी उँगली के नाखून से काट दिया।  हालाँकि उन्होंने ब्रह्मा जी के पांचवें सिर के रूप में अहंकार का नाश किया था किन्तु फिर भी उन पर ब्रह्म हत्या का पाप लग चुका था। 
इसी कारण ब्रह्मा जी का पांचवा सर कालभैरव के हाथों से नहीं छुट रहा था, उन्हें इस पाप से मुक्ति प्राप्त करने के लिए शिव जी ने उन्हें तीर्थ स्थानों की यात्रा करने और भिक्षा मांगने के लिए कहा और बताया कि जिस भी तीर्थ स्थान पर उनके हाथ में मौजूद ब्रह्मा जी का पाँचवा सिर गिर जायेगा वहीं उन्हें इस पाप से मुक्ति  मिलेगी। 

तीनों लोकों से न्यारी काशी 

पाप-मुक्ति के लिए काल भैरव ने हर तीर्थ स्थान की यात्रा की किन्तु उन्हें इस पाप से मुक्ति नहीं मिली, ब्रह्म हत्या का पाप उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था । वह ब्रह्मा जी का सर हाथ में लिए तीनो लोकों में भटकते रहे, भटकते हुए वह विष्णुलोक भी पहुचें जहाँ भगवान विष्णु ने उनका स्वागत किया, यही माँ लक्ष्मी ने इन्हें मनोरथ विद्या का आशीर्वाद दिया जिसके द्वारा बाबा कालभैरव सभी मनोरथों को पूरा करने में सक्षम हो गए । भगवान विष्णु ने ही श्री कालभैरव को शिव जी के त्रिशूल पर स्थित काशी नगरी के बारे में बताया और तीनों लोकों से न्यारी काशी नगरी जाने की सलाह दी।

 

 

विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता

चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत की तिथि कैसे निर्धारित हुई?

पंचांग-सत्यापित
पंचांग तिथिफाल्गुन, कृष्ण सप्तमी
गणना का आधारतिथि-आधारित (चंद्र-सौर)
गणना पद्धतिदृक् गणित (Meeus)
संदर्भ स्थानVishweshwarganj
आराध्य देवShri Kaal Bhairav
माह पद्धतिपूर्णिमांत (उत्तर भारत)
अमांत माह (दक्षिण/महा./गुज.)फाल्गुन
अंतिम संशोधन05 Sep 2026

तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय प्रचलित तिथि से होता है, और सूर्योदय प्रत्येक नगर में भिन्न होता है — इसलिए स्थान बदलने पर तारीख़ में एक दिन का अंतर संभव है। इसी कारण Bhakti Sarovar पर समय एक राष्ट्रीय औसत नहीं, बल्कि आपके चुने हुए नगर के वास्तविक सूर्योदय के अनुसार गणना किए जाते हैं। यह तिथि पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) के अनुसार है, जिसमें यह चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आती है। दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और गुजरात में प्रचलित अमांत पंचांग में यही दिन फाल्गुन माह में गिना जाता है — तिथि और पर्व वही रहते हैं, केवल माह का नाम भिन्न होता है। पूरी गणना पद्धति पढ़ें →

इस पृष्ठ के योगदानकर्ता
प्रमूल लेखनप्रियंका शर्मा चशास्त्रीय सत्यापनचन्द्रभूषण मणि त्रिपाठी दीसंपादकीय समीक्षादीपक शर्मा

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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

2027 में चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत 29 मार्च 2027 (सोमवार) को है।
चैत्र मासिक कालाष्टमी व्रत फाल्गुन, कृष्ण सप्तमी तिथि को मनाया जाने वाला पर्व है।
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अस्वीकरण

इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह केवल सामान्य सूचना हेतु हैं। भक्ति सरोवर इनका समर्थन नहीं करता। जानकारी विभिन्न पंचांग, प्रवचनों, मान्यताओं और धर्मग्रंथों से संग्रहित है। कृपया अपने विवेक का उपयोग करें।