दस महाविद्याओं में अग्रणी भगवती महाकाली को ही आद्यकाली कहा जाता है। कालिकापुराण में वर्णित कथा अनुसार महामाया का उग्र स्वरूप ही कालों का संहार करने वाली काली हैं, जिनके सौम्य-उग्र विविध प्रस्फुटन महाविद्या-परंपरा को जन्म देते हैं। तांत्रिक दृष्टि से उनका प्राकट्योत्सव आश्विन कृष्ण अष्टमी को माना गया, किंतु अनेक भक्त जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) की रात्रि को ही आद्यकाली-पूजन करते हैं। तब घटती वर्षा, शरद का आरम्भ और स्वच्छ आकाश साधना का अनुकूल परिवेश रचते हैं। व्रती को शिशु-सदृश सरल हृदय से ध्यान करते हुए काली सहस्रनाम, अष्टोत्तरशतनाम, कवच-स्तोत्र या हृदय का मानसिक जप करना चाहिए; सावधानीपूर्वक, एकाग्र मन से किया गया यह पाठ शीघ्र फल प्रदान करता है और साधक को निर्भयता, त्वरित अनुग्रह तथा आध्यात्मिक तेज से आलोकित कर देता है।