भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी जब रोहिणी नक्षत्र से योग बनाती है, वही पावन दिन अष्टमी-रोहिणी कहलाता है। केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में इसी अवसर पर कृष्ण जन्मोत्सव “श्री जयंती” हर्षोल्लास से मनाया जाता है। अब वर्षा हल्की पड़ने लगी होती है, धान के खेत लहराते हैं और शरद की उजली धूप आकाश में झलकने लगती है, पर्यावरण स्वयं उत्सव का स्वर रच देता है। भोर में स्नान कर भक्त श्वेत या पीले वस्त्र पहनते, बाल-गोपाल का पंचामृत-अभिषेक करते और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108-बार जप करते हैं। गुरुवायूर तथा उडुपी के मंदिरों में सजे हाथियों की झाँकी, उरियाडी (मटकी-फोड़) और छप्पन-भोग की आरती दिन-भर चलती है। रात्रि-पूजा के बाद उपवास पंचामृत-पायसम से खोला जाता है। श्रद्धा है कि इस योग में श्रीकृष्ण की आराधना विद्या, पारिवारिक सौहार्द और अन्न-समृद्धि का आशीर्वाद देती है।