भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा पर मनाया जाने वाला दही हाण्डी उत्सव नटखट बालकृष्ण की माखन-चोरी लीला का जीवंत स्मरण है। कथा है कि गोपियाँ दही-मक्खन बचाने को मटकी ऊँचाई पर टाँग देती थीं, पर चतुर कान्हा मित्रों की मँजीर बनाकर ऊपर चढ़ते, मटकी फोड़ते और माखन बाँटते। इसी छवि को आज गोकुल से लेकर महानगरों तक ‘गोविंदा’ दल दोहराते हैं, मानव-पिरामिड बनाकर ऊर्ध्व में लटकी हाण्डी तक पहुँचते हैं और फोड़ते ही दही-मक्खन की वर्षा होती है। पहले यह उत्सव मुख्यतः महाराष्ट्र और गुजरात तक सीमित था, अब पूरे देश में ढोल-ताशों, शंख-घंट और ‘गोविंदा आला रे’ की गूँज के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। दही हाण्डी साहस, समन्वय और बालकृष्ण की अल्हड़ आनन्द-भावना का लोकोत्सव बन चुका है।