देवी छिन्नमस्ता प्राकट्योत्सव वैसाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को श्रद्धा और साधना के साथ मनाया जाता है। वैसाख का महीना तप, आत्मसंयम और गूढ़ साधनाओं के लिए विशेष माना जाता है, इसलिए इस मास में महाविद्या उपासना का महत्व और बढ़ जाता है। दस महाविद्याओं में देवी छिन्नमस्ता छठी महाविद्या हैं। मार्कंडेय पुराण और शिवपुराण में उनके स्वरूप का विस्तृत वर्णन मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार देवी ने अपनी सहायक योगिनियों अजया और विजया की रुधिर पिपासा शांत करने के लिए स्वयं अपना मस्तक काटकर उन्हें रक्त प्रदान किया था, इसी कारण वे छिन्नमस्तिका कहलाईं। यह स्वरूप त्याग, शक्ति और नियंत्रण का प्रतीक है। मान्यता है कि देवी की साधना जिस भाव से की जाए, वे उसी रूप में साधक को दर्शन देती हैं और गहन आध्यात्मिक जागरण प्रदान करती हैं।