दुर्गा अष्टमी, जिसे महाष्टमी भी कहा जाता है, नवरात्रि का वह उज्ज्वल दिन है जब देवी के महागौरी रूप की आराधना की जाती है। श्वेत वस्त्रों में अलंकृत, पूर्ण चन्द्र‑सी दीप्त महागौरी करुणा और शुद्धता की मूर्तिमान छवि हैं; मन से निष्कपट होकर उनका पूजन करने पर संचित पाप क्षीण होते हैं और अंतःकरण निर्मल हो उठता है। परम्परा है कि अष्टमी की रात्रि में एक पान‑पत्र पर गुलाब की सात पंखुड़ियाँ रखकर मां को समर्पित किया जाए, ऐसा माना जाता है कि इससे लक्ष्मीजी का सहज अनुग्रह मिलता है। पूजा के समय “ॐ क्लीं ह्रीं वरदायै नमः” बीज‑मंत्र का जप, घृत‑दीप, कुमकुम, अक्षत और श्वेत पुष्पों का अर्पण तथा कन्या‑पूजन अनिवार्य माने गए हैं। श्रद्धाभाव से सम्पन्न यह महोत्सव दैन्य, रोग और विघ्नों का नाश कर आरोग्य, साहस और पारिवारिक मंगल का दृढ़ आधार रचता है।