भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला श्री वराह प्राकट्योत्सव विष्णु के तृतीय अवतार की स्मृति है। वर्षा की थमती रिमझिम, हरे-भरे खेत और शरद के प्रथम संकेतों के बीच यह पर्व धरती के उद्धारक वराह भगवान की जय-ध्वनि करता है। पुराण बताते हैं कि श्रीहरि ने इसी तिथि पर वराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष दैत्य का वध किया और डूबी हुई पृथ्वी को अपनी प्रतापी शूकराकृति पर उठा लिया। देश-भर में यह उत्सव उल्लास से मनाया जाता है; मथुरा के प्राचीन वराह मंदिर में पंचामृत-अभिषेक, वेदघोष और कीर्तन दिन-भर गूँजते हैं, जबकि तिरुमला के भू-वराह स्वामी मंदिर में विशाल विशेष पूजन होता है। भक्त तिल, घृत और लाल पुष्प अर्पित कर “ॐ श्री वराहाय नमः” मंत्र जपते हैं, जिससे संकटों का नाश और परिवार में स्थायित्व व समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।