भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाई जाने वाली हरतालिका तीज वर्ष की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीज मानी जाती है। सुबह से रात तक निर्जला उपवास रखने वाली महिलाएँ संध्या में शिव-पार्वती का पूजन कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं, जबकि कई स्थानों पर कुँवारी कन्याएँ सुयोग्य वर-प्राप्ति हेतु यही व्रत करती हैं। हरे रंग की साड़ी, चूड़ियाँ और मेहँदी अनिवार्य शृंगार हैं, क्योंकि हरित रंग समृद्धि व नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। पुराण कथा बताती है कि माता पार्वती ने इसी तपस्यामय व्रत से महादेव को वर रूप में पाया था; अतः हरतालिका तीज आज भी अटल प्रेम, दृढ़ संकल्प और पारिवारिक सौहार्द का उत्सव है।