कार्तिक शुक्ल पंचमी, लाभ पंचमी, दीपोत्सव-पर्व का सुखद उपसंहार और गुजराती नववर्ष का व्यापारिक मंगलाचार है। मान्यता है कि दिवाली के दीप अभी बुझते नहीं, बल्कि इस पंचमी तक सौभाग्य की लौ और तेज़ होती रहती है। व्यापारी-समुदाय आज के दिन नए बही-खातों का शुभारम्भ “श्री गणेशाय नमः” लिखकर करता है, ताकि आने वाला वर्ष लाभ, प्रगति और निर्बाध प्रवाह से भरा रहे। जिन घरों या प्रतिष्ठानों में दीपावली की रात्रि शारदा पूजन न हो सका, वे इसी दिन सरस्वती-आराधना कर विद्या-कौशल का आशीष लेते हैं। गुजरात-भर में दुकानों पर रंगोली, तोरण और दीप-पंक्तियाँ पुनः सजीव हो उठती हैं, सप्तसुरों-सी गूँजती घंटियों के बीच “लाभोः लाभः” की मंगल-आहट अगले कारोबारी चक्र के लिए आत्मविश्वास और रसमय उत्साह का संदेश देती है।