ज्येष्ठ अमावस्या का दिन शनिदेव के जन्मोत्सव के रूप में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि पुराणों के अनुसार इसी तिथि पर न्यायप्रिय शनि देव का अवतरण हुआ था। मंद गति से चलने वाले ये नवग्रहों में एकमात्र ऐसे देव हैं जिन्हें कलियुग का दण्डाधिकारी भी कहा जाता है—शत्रु नहीं, कर्मफल के निष्पक्ष वितरक। इस कारण ज्येष्ठ अमावस्या पर शनि-दोष निवारण के उपाय, जैसे तेल-अभिषेक, काली उड़द या काला तिल दान तथा शनि चालीसा का पाठ, खूब किए जाते हैं। परंपरा बताती है कि इस दिन वट सावित्री व्रत के साथ-साथ पिंडदान और गऊ-दान करने से पूर्वजों की शांति तथा परिवार की सुख-समृद्धि मिलती है। पर्व का आरंभ प्रातः नदी, सरोवर या कुंड में स्नान से करें; सूर्यदेव को तांबे के पात्र से जल अर्पित करें और बहते जल में काले तिल प्रवाहित करें। माना जाता है कि ऐसे संकल्पपूर्वक किए गए दान-धर्म और शनि पूजन से जीवन में संतुलन आता है, बाधाएँ शांत होती हैं और कर्मों का फल सुगम हो जाता है।