अमावस्या के बाद जब पहली बार शीतल चाँद आकाश में झलकता है, उस दिन को चन्द्र दर्शन कहा जाता है। देश-भर में यह तिथि श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है, क्योंकि मान्यता है कि चंद्रदेव बुद्धि, भावनाओं और मन के अधिपति हैं। परंपरा के अनुसार, सूर्यास्त के तुरंत बाद की वेला चंद्रमा के दर्शन और पूजन के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। इस समय व्रत रखकर चाँद को अर्ध्य अर्पित किया जाता है और मन में शांति, सौम्यता व सद्बुद्धि का वर मांगा जाता है। ज्योतिष कहता है कि जिनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा नीच का हो, या जो निरंतर मानसिक तनाव से जूझ रहे हों, उन्हें विशेष रूप से इस दिन चन्द्र दर्शन करना चाहिए। इसके सौम्य प्रकाश में मन स्थिर होता है और चिंताओं का भार हल्का पड़ता है।