आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी या भैरवाष्टमी कहा जाता है, जब भगवान शिव के कालरूप श्री कालभैरव की विशेष आराधना की जाती है। वर्ष भर में बारह कालाष्टमी व्रत आते हैं, परन्तु माघ मास की कालाष्टमी को सर्वोच्च महत्त्व मिलता है। इस पावन तिथि पर भक्त श्री भैरव के आठ स्वरूपों—असितांग, चंड, रूरू, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहार—का विधिपूर्वक पूजन करते हैं, जिनमें बटुक भैरव की उपासना विशेष प्रचलित है। प्रातः स्नान के बाद तिल, सरसों के तेल का दीपक, काले तिल, पुष्प और बिल्वपत्र अर्पित कर भैरव स्तुति की जाती है। संध्या समय कालभैरव अष्टक का पाठ कर प्रसाद वितरित किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से समस्त भय दूर होते हैं और साधक को निर्भय, संतुलित जीवन का वरदान प्राप्त होता है।