श्रावण शुक्ल षष्ठी को मनाया जाने वाला स्कन्द षष्ठी देवसेनापति भगवान कार्तिकेय (सुब्रह्मण्य) की आराधना का दिन है। परंपरा के अनुसार व्रती प्रातः स्नान कर पीले या लाल वस्त्र धारण करते हैं, फिर मिट्टी अथवा धातु की षडानन प्रतिमा स्थापित कर चंपा-पुष्प, गुड़-पुगाके लड्डू, लाल कंकण और दुर्वा अर्पित करते हैं। छह बातियों वाला दीप जलाकर “ॐ तत्पुरुषाय विधमहे महा-सैन्याय धीमहि, तन्नो स्कन्दा प्रचोदयात्” गायत्री-मंत्र का 108 बार जप किया जाता है। मान्यता है कि इस साधना से संतान-सुख, रोग-निवारण और दरिद्रता से मुक्ति मिलती है। व्रती फलाहार रखते हुए संध्या-काल में समीपस्थ जल-स्रोत को नमस्कार कर आरती उतारते हैं। कुछ स्थानों पर बालक-बालिकाएँ कागज़ या मिट्टी के सर्प बनाकर नाग-पूजन भी करते हैं, क्योंकि स्कन्द को सर्पों का रक्षक कहा गया है।