आश्विन कृष्ण चतुर्दशी की रात को आने वाली मासिक शिवरात्रि शरद की शीतल हवाओं और निर्मल आकाश के बीच मन‑बुद्धि को शिव‑तत्त्व से आलोकित करती है। वर्षा पूरी तरह थम चुकी होती है; चांदनी धानी खेतों पर पड़कर वातावरण में पवित्र निस्तार भर देती है। व्रती दिन‑भर फलाहार या निर्जल रहते हैं, सन्ध्या‑स्नान के बाद श्वेत या काले वस्त्र धारण कर कुश‑आसन पर बैठते हैं और “ॐ नमः शिवाय” जप का संकल्प लेते हैं। चार प्रहर की रात्रि‑जागरण में शिवलिंग को जल, दुग्ध, दही, घृत और मधु से क्रमशः अभिषेकित किया जाता है; हर प्रहर बिल्व‑पत्र, धूप‑दीप, अक्षत और श्वेत पुष्प चढ़ाए जाते हैं। दीप‑त्रयोदशी आरती तथा रुद्राष्टक पाठ के पश्चात गौ‑दान या किसी ज़रुरतमंद को अन्न‑वस्त्र प्रदान करना शुभ माना गया है। आश्विन की यह लघु शिवरात्रि विशेषतः रोग‑शमन, आकस्मिक संकट‑निवारण तथा आत्मिक शान्ति का प्रबल साधन मानी जाती है; नियमित व्रत साधक के जीवन में आरोग्य, समृद्धि और शिव‑कृपा का स्थायी स्रोत खोल देता है।