कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला संकष्टी व्रत हर माह भक्तों को विघ्नहर्ता गणेश की कृपा का अवसर देता है। आषाढ़ मास की कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी वर्षा ऋतु के उमस भरे समय पर आती है, जब बादलों की गड़गड़ाहट धरती को पवित्र करती है। शिव-रहस्य पुराण के अनुसार इसी चतुर्थी के शुक्ल पक्ष में भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश का प्राकट्य हुआ था। व्रती सन्ध्या स्नान के बाद शुद्ध जल, पंचामृत, दुर्वा, पुष्प तथा अक्षत अर्पित कर गणपति का पूजन करते हैं। चन्द्र दर्शन के पश्चात ही फलाहार या भोजन ग्रहण किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस विधिपूर्वक उपासना से घर की नकारात्मक ऊर्जा शांत होती है, कलह समाप्त होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि तथा मानसिक शान्ति स्थायी रहती है।