आषाढ़ पूर्णिमा से आरम्भ होकर श्रावण पूर्णिमा तक चलने वाला कोकिला व्रत वर्षा ऋतु में मनमोहक उत्सव बन जाता है। शास्त्रों के अनुसार, शिवजी के साथ विवाह की अभिलाषा से पहली बार माता पार्वती ने यह व्रत किया था। पूर्वजन्म में उन्हें कोयल का शाप मिला, दस सहस्र वर्ष तक नंदन वन में भटकने के बाद उन्होंने उसी कोयल की पूजा की; प्रसन्न शिवजी ने पार्वती को पत्नी-स्वरूप स्वीकार किया। व्रतधारी महिलाएँ जड़ी-बूटियों मिले जल से स्नान करती हैं और कोयल के दर्शन या स्वर को अत्यन्त शुभ मानती हैं। मान्यता है कि कोकिला व्रत से विवाह में आ रही बाधाएँ दूर होती हैं, दाम्पत्य जीवन मधुर बनता है तथा वर्षा-काल की ताज़गी के साथ घर-आँगन में सुख-समृद्धि का मधुर कलरव गूँज उठता है।