चैत्र दर्श अमावस्या हिंदू पंचांग में एक विशेष महत्व रखती है। चैत्र मास वसंत ऋतु का समय होता है, जब प्रकृति नवजीवन की ओर बढ़ती है, वहीं यह अमावस्या आत्मशुद्धि और पितृ स्मरण का अवसर प्रदान करती है। शुक्ल पक्ष के समापन पर आने वाली इस तिथि को दर्श अमावस्या कहा जाता है, क्योंकि इस रात चंद्रदेव के दर्शन नहीं होते। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पितरों को प्रसन्न करना सरल होता है, इसलिए इसे श्राद्ध की अमावस्या भी कहा जाता है। पितरों की शांति के लिए दान, तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्म किए जाते हैं। कालसर्प दोष निवारण की पूजा के लिए भी यह तिथि उपयुक्त मानी गई है। संध्या समय पीपल के वृक्ष की परिक्रमा कर सरसों के तेल का दीपक अर्पित करने का विधान है। यदि जीवन में बाधाएं बनी हों, तो इस दिन व्रत रखकर चंद्रदेव की पूजा करने से शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।