आषाढ़ मास बारिश का पहला महीना माना जाता है। इस समय बादल घिरने लगते हैं और गर्मी कम हो जाती है। जब इसी महीने की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी रविवार को आए, तो उसे ‘रवि प्रदोष’ कहते हैं। इस दिन लोग सुबह स्नान करके उपवास का संकल्प लेते हैं। शाम को सूर्यास्त से पहले शिवजी की पूजा होती है और सूर्यदेव को जल चढ़ाया जाता है। पूजा के लिए दूध, जल, बिल्वपत्र, धूप-दीप जैसी साधारण चीज़ें ही काफी हैं। मान्यता है कि यह व्रत रखने से आयु बढ़ती है, स्वास्थ्य सुधरता है और सम्मान मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि लगातार ग्यारह रवि प्रदोष या साल भर के चौबीस प्रदोष व्रत करने से मन की कामनाएँ पूरी होती हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।