माघ शुक्ल पंचमी का मधुर प्रभात बसंत पंचमी के उल्लास से सराबोर रहता है। सरसों के खेतों की पीत आभा और मन को छूती मन्द बयार घोषणा करती है कि शिशिर का कठोरपन विदा ले रहा है, अब ऋतुराज बसंत का पदार्पण है। इस दिन विद्या और कला की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती का विशेष पूजन होता है—ऋग्वेद में जिनका वर्णन “प्रणो देवी सरस्वती…” के रूप में हुआ है, वे बुद्धि, प्रज्ञा और रचनात्मक ऊर्जा की संरक्षिका हैं। शुभ मुहूर्त पर श्वेत या हल्के पीले वस्त्र धारण कर, वीणा-वंदनी को अक्षत, सफ़ेद पुष्प, मधुर फल व ऋतुफल अर्पित किए जाते हैं। विद्यार्थी पुस्तकें और लेखनी माँ सरस्वती के चरणों में रखकर विद्यारम्भ का संकल्प लेते हैं। जन-विश्वास है कि इस दिन की आराधना से ज्ञान, वाणी-शक्ति और रचनात्मकता त्रिवेणी-संगम की भाँति जीवन में प्रवाहित होती है।